BS-6 का नया वार: लैब टेस्ट खत्म, रियल रोड पर होगी कारों की परीक्षा

भारत में वाहन उत्सर्जन (Emission) नियमों को और सख्त करने की तैयारी हो चुकी है। BS-6 के बाद अब अगला बड़ा कदम है WLTP (Worldwide Harmonised Light Vehicles Test Procedure) आधारित टेस्टिंग और रियल-वर्ल्ड ड्राइविंग एमिशन (RDE) मॉनिटरिंग। इसका मतलब है कि अब सिर्फ लैब में नहीं, बल्कि सड़क पर भी गाड़ियों की असली परफॉर्मेंस और प्रदूषण स्तर को जांचा जाएगा।
यह बदलाव सिर्फ एक तकनीकी अपडेट नहीं, बल्कि ऑटोमोबाइल इंडस्ट्री के लिए बड़ा स्ट्रक्चरल रिफॉर्म है। आइए समझते हैं सभी महत्वपूर्ण और “हिडन” पॉइंट्स विस्तार से।
1. WLTP क्या है?
WLTP एक ग्लोबल टेस्टिंग स्टैंडर्ड है जिसे यूरोप सहित कई देशों में अपनाया गया है। यह पुराने NEDC (New European Driving Cycle) की तुलना में अधिक यथार्थवादी (Realistic) टेस्टिंग प्रक्रिया है।
WLTP की खास बातें:
  • ज्यादा वास्तविक ड्राइविंग पैटर्न
  • अलग-अलग स्पीड रेंज (लो, मीडियम, हाई, एक्स्ट्रा-हाई)
  • लंबा टेस्ट समय
  • ज्यादा दूरी
  • अधिक तापमान और लोड कंडीशन
इसका मकसद यह सुनिश्चित करना है कि गाड़ी का माइलेज और उत्सर्जन आंकड़ा कागज पर नहीं, बल्कि असल सड़क जैसी परिस्थितियों में भी सही हो।
2. BS-6 के साथ WLTP क्यों जरूरी?
भारत ने 2020 में BS-6 लागू किया, जिससे सल्फर कंटेंट 10 ppm तक घटाया गया। इससे डीजल और पेट्रोल गाड़ियों के उत्सर्जन में बड़ी कमी आई। लेकिन समस्या यह रही कि:
  1. लैब टेस्ट और रियल-वर्ल्ड उत्सर्जन में अंतर पाया गया
  2. कुछ कंपनियों पर डेटा मैनिपुलेशन के आरोप भी लगे
  3. माइलेज और CO2 के दावे कई बार वास्तविकता से अलग निकले
इसलिए सरकार अब RDE (Real Driving Emission) + WLTP आधारित टेस्टिंग की ओर बढ़ रही है।
3. RDE क्या है?
RDE का मतलब है — गाड़ी को सड़क पर चलाकर उसका उत्सर्जन मापना।
इसमें गाड़ी पर PEMS (Portable Emission Measurement System) लगाया जाता है, जो रियल टाइम में NOx, CO2, PM (Particulate Matter) आदि को रिकॉर्ड करता है।
RDE के फायदे:
  • असली ट्रैफिक में टेस्ट
  • चढ़ाई, ट्रैफिक जाम, ओवरटेकिंग जैसे हालात शामिल
  • तापमान और ऊंचाई का असर भी मापा जाता है
4. BS-6 Phase 2 और आगे क्या?
भारत में BS-6 Phase 2 पहले ही लागू हो चुका है, जिसमें RDE को शामिल किया गया है। अब अगला चरण WLTP आधारित फ्यूल एफिशिएंसी और CO2 मानकों को अपनाने की दिशा में है।
संभावित बदलाव:
  • सख्त CO2 लक्ष्य
  • फ्यूल कंजम्प्शन का नया स्टैंडर्ड
  • इलेक्ट्रॉनिक मॉनिटरिंग सिस्टम (OBD-II) का सख्त उपयोग
  • इंजन कैलिब्रेशन में बदलाव
5. आम ग्राहकों पर क्या असर पड़ेगा?
> गाड़ियों की कीमत बढ़ सकती है
नई टेक्नोलॉजी, बेहतर कैटेलिटिक कन्वर्टर, DPF (Diesel Particulate Filter), SCR सिस्टम की लागत बढ़ेगी।
> माइलेज के दावे ज्यादा सटीक होंगे
अब कंपनी जो माइलेज बताएगी, वह वास्तविकता के ज्यादा करीब होगा।

> डीजल गाड़ियों पर ज्यादा दबाव
NOx नियंत्रण के लिए डीजल गाड़ियों को ज्यादा एडवांस सिस्टम की जरूरत पड़ेगी।
> इलेक्ट्रिक और हाइब्रिड को बढ़ावा
सख्त CO2 मानकों से EV और Hybrid गाड़ियों की मांग बढ़ेगी।
6. ऑटो इंडस्ट्री के लिए क्या चुनौती?
>  इंजन री-डिजाइन
कंपनियों को इंजन ट्यूनिंग दोबारा करनी होगी।
>  सप्लाई चेन में बदलाव
उच्च गुणवत्ता वाले सेंसर और फिल्टर की जरूरत।
>  R&D खर्च बढ़ेगा
नई टेस्टिंग लैब और सॉफ्टवेयर डेवलपमेंट की लागत।
>  छोटी कंपनियों पर दबाव
लो-वॉल्यूम मैन्युफैक्चरर्स के लिए लागत भारी पड़ सकती है।

7. “Hidden Points” जो कम चर्चा में हैं
1. थ्री-सिलेंडर और टर्बो इंजन पर असर
छोटे टर्बो इंजन को रियल-वर्ल्ड टेस्ट में ज्यादा मेहनत करनी पड़ती है, जिससे उत्सर्जन बढ़ सकता है।
2. माइलेज गेम खत्म
अब सिर्फ गियर रेशियो बदलकर बेहतर लैब माइलेज दिखाना मुश्किल होगा।
 3. EV का भी रियल रेंज टेस्ट
WLTP आधारित रेंज टेस्ट से EV की “क्लेम्ड रेंज” भी ज्यादा वास्तविक होगी।
4. OBD मॉनिटरिंग सख्त
अगर उत्सर्जन सिस्टम में गड़बड़ी होगी तो तुरंत डैशबोर्ड पर चेतावनी आएगी।
5. सेकंड-हैंड मार्केट पर असर
ज्यादा कॉम्प्लेक्स सिस्टम का मतलब है – मेंटेनेंस खर्च ज्यादा।
6. ग्रामीण क्षेत्रों में असर
खराब ईंधन या सर्विसिंग की कमी से नई गाड़ियों का प्रदर्शन प्रभावित हो सकता है।
8. सरकार का बड़ा लक्ष्य
  • 2070 तक नेट-जीरो लक्ष्य
  • शहरी प्रदूषण कम करना
  • ग्लोबल स्टैंडर्ड से तालमेल
  • आयात-निर्यात में समानता
भारत अब यूरोप और जापान जैसे देशों की तरह उत्सर्जन मानकों को सख्ती से लागू करना चाहता है।
9. क्या यह “डिजल का अंत” है?
पूरी तरह नहीं, लेकिन डीजल गाड़ियों के लिए चुनौती जरूर है।
  • SUV सेगमेंट में डीजल की मांग बनी रहेगी
  • छोटे डीजल इंजन धीरे-धीरे कम हो सकते हैं
  • पेट्रोल-हाइब्रिड का रोल बढ़ेगा
10. भविष्य की दिशा
आने वाले वर्षों में:
  • 48V माइल्ड हाइब्रिड सिस्टम आम होंगे
  • प्लग-इन हाइब्रिड विकल्प बढ़ेंगे
  • फुल EV ट्रांजिशन तेज होगा
  • ग्रीन हाइड्रोजन आधारित कमर्शियल व्हीकल भी चर्चा में आएंगे
WLTP और RDE आधारित BS-6 नियम सिर्फ एक तकनीकी अपडेट नहीं, बल्कि ऑटोमोबाइल सेक्टर में बड़ा बदलाव है।
अब गाड़ियों का असली टेस्ट लैब नहीं, सड़क होगी।
कंपनियों को पारदर्शिता अपनानी होगी।
ग्राहकों को ज्यादा सटीक डेटा मिलेगा।
और देश को मिलेगा – कम प्रदूषण और बेहतर पर्यावरण।
यह बदलाव शुरुआत है उस भविष्य की, जहां “पेपर पर माइलेज” नहीं, बल्कि “रियल रोड पर परफॉर्मेंस” मायने रखेगी।

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