मध्य पूर्व में चल रही ईरान-अमेरिका टकराव की आग पूरी दुनिया को प्रभावित कर रही है। हर दिन नई खबरें सामने आ रही हैं—कभी युद्ध, कभी बातचीत की उम्मीद, तो कभी सीजफायर की चर्चा। इसी बीच एक बड़ा सवाल उठता है: क्या पाकिस्तान इस युद्ध को रोकने के लिए सही जगह बन सकता है? हालांकि पाकिस्तान ने खुद आगे बढ़कर इस संघर्ष में मध्यस्थ बनने और मीटिंग होस्ट करने की पेशकश की है, लेकिन हकीकत इतनी आसान नहीं है। कई ऐसे कारण हैं जिनकी वजह से पाकिस्तान में ईरान-अमेरिका सीजफायर मीटिंग होना बेहद मुश्किल, लगभग नामुमकिन माना जा रहा है। 1. भरोसे की कमी (Trust Deficit सबसे बड़ी बाधा) ईरान और अमेरिका के बीच दशकों से तनाव रहा है। लेकिन इस समय स्थिति और भी गंभीर है। >अमेरिका ने ईरान पर हमले किए >ईरान ने सीधे बातचीत से इनकार किया >दोनों देश एक-दूसरे के इरादों पर शक कर रहे हैं रिपोर्ट्स के मुताबिक, ईरान ने कई बार साफ कहा है कि वह सीधे अमेरिका से बात नहीं कर रहा है और उसे अमेरिकी दूतों पर भरोसा नहीं है ऐसे माहौल में पाकिस्तान जैसे तीसरे देश में मीटिंग तभी संभव होती है जब दोनों पक्ष उस देश पर पूरी तरह भरोसा करें—जो अभी नहीं है। 2. पाकिस्तान की “Neutral” छवि पर सवाल पाकिस्तान खुद को एक न्यूट्रल मध्यस्थ के रूप में पेश कर रहा है, लेकिन वास्तविकता थोड़ी अलग है। >पाकिस्तान के अमेरिका से भी संबंध हैं >वहीं ईरान के साथ भी सीमित सहयोग है >साथ ही पाकिस्तान का सऊदी अरब से रक्षा समझौता भी है इस वजह से ईरान को शक है कि पाकिस्तान पूरी तरह निष्पक्ष नहीं है। विश्लेषकों के अनुसार, पाकिस्तान “दोनों तरफ संतुलन” बनाने की कोशिश कर रहा है, लेकिन यह रणनीति उसे पूरी तरह भरोसेमंद नहीं बनाती, इसलिए ईरान पाकिस्तान को “safe mediator” के रूप में पूरी तरह स्वीकार नहीं कर पा रहा। 3. पाकिस्तान के अंदर अस्थिरता और विरोध सबसे बड़ा कारण है पाकिस्तान की आंतरिक स्थिति। >वहां अमेरिका विरोधी प्रदर्शन हुए >कराची में अमेरिकी दूतावास पर हमला तक हुआ >कई लोगों की मौत और हिंसा हुई यह दिखाता है कि पाकिस्तान के अंदर माहौल बहुत संवेदनशील है ऐसे देश में हाई-लेवल सीजफायर मीटिंग कराना सुरक्षा के लिहाज से बहुत बड़ा रिस्क है। 4. क्षेत्रीय तनाव और युद्ध का फैलाव यह सिर्फ अमेरिका और ईरान का संघर्ष नहीं है। इसमें कई देश शामिल हैं: >इज़राइल >सऊदी अरब >खाड़ी देश >तुर्की और मिस्र (मध्यस्थ) रिपोर्ट्स के अनुसार, कई देशों ने पहले भी मध्यस्थता की कोशिश की लेकिन सफलता नहीं मिली ऐसे मल्टी-लेयर कॉन्फ्लिक्ट में एक ही देश (जैसे पाकिस्तान) में मीटिंग करना आसान नहीं होता। 5. आर्थिक और रणनीतिक हित इस युद्ध का सीधा असर तेल बाजार और वैश्विक अर्थव्यवस्था पर पड़ रहा है। >स्ट्रेट ऑफ होर्मुज में तनाव >तेल सप्लाई प्रभावित >पाकिस्तान खुद आर्थिक संकट से जूझ रहा है एक रिपोर्ट के अनुसार, पाकिस्तान इस युद्ध के कारण तेल सप्लाई और आर्थिक दबाव से प्रभावित है ऐसे में पाकिस्तान खुद एक “स्टेकहोल्डर” बन जाता है, जिससे उसकी निष्पक्षता और कम हो जाती है। 6. बैकचैनल बातचीत बनाम ओपन मीटिंग अभी जो बातचीत हो रही है, वह सीधे नहीं बल्कि “बैकचैनल” के जरिए हो रही है। >पाकिस्तान, तुर्की, मिस्र जैसे देश संदेश पहुंचा रहे हैं >लेकिन खुली मीटिंग अभी तक तय नहीं हुई व्हाइट हाउस ने भी किसी औपचारिक मीटिंग की पुष्टि नहीं की है इसका मतलब साफ है—अभी हालात इतने खराब हैं कि खुली बातचीत भी संभव नहीं। 7. पाकिस्तान खुद कई संकटों में फंसा है पाकिस्तान इस समय कई मोर्चों पर संघर्ष कर रहा है: >अफगानिस्तान के साथ टकराव >आंतरिक आतंकवाद >आर्थिक संकट >सीमा सुरक्षा मुद्दे ऐसे में वह एक स्थिर और सुरक्षित “डिप्लोमैटिक हब” नहीं बन पाता। 8. अन्य देशों के बेहतर विकल्प कुछ देश ऐसे हैं जिन्हें अधिक भरोसेमंद माना जाता है: >ओमान >कतर >तुर्की >स्विट्ज़रलैंड हालांकि कतर ने खुद कहा है कि वह सीधे मध्यस्थता में शामिल नहीं है, लेकिन वह शांति प्रयासों का समर्थन करता है इन देशों की “neutral image” पाकिस्तान से ज्यादा मजबूत है। 9. ईरान की शर्तें और सख्त रुख ईरान ने साफ कर दिया है: >पहले हमले बंद हों >नुकसान की भरपाई हो >तभी बातचीत संभव है जब तक ये शर्तें पूरी नहीं होतीं, कोई भी मीटिंग (चाहे पाकिस्तान में हो या कहीं और) मुश्किल है 10. अमेरिका की रणनीति और दबाव अमेरिका अभी भी सैन्य दबाव बनाए हुए है: >अतिरिक्त सैनिक भेजने की तैयारी >हमले जारी >साथ ही बातचीत की बात यह “dual strategy” (war + talk) ईरान को और अविश्वास में डालती है। पाकिस्तान ने भले ही ईरान-अमेरिका के बीच शांति वार्ता के लिए खुद को एक मंच के रूप में पेश किया हो, लेकिन जमीनी हकीकत यह है कि: >भरोसे की कमी >आंतरिक अस्थिरता >राजनीतिक झुकाव >क्षेत्रीय जटिलताएं >और दोनों देशों का सख्त रुख इन सभी कारणों से पाकिस्तान में सीजफायर मीटिंग होना फिलहाल बहुत मुश्किल है।

ईरान-अमेरिका वार्ता: पाकिस्तान क्यों नहीं बन पा रहा ‘Neutral Ground’?
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